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Kranti Kyon? Kaise?

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“आखिर क्रांति की आवश्यकता क्यों नहीं?” → आखिरकार, क्रांति (मूलभूत बदलाव या आमूल परिवर्तन) की जरूरत क्यों नहीं है?”क्यों नहीं क्रांति?” → क्रांति क्यों नहीं होनी चाहिए?”मानव शांति, आर्थिक लोकतंत्र,सामाजिक लोकतंत्र आदि के लिए कब बदलाव की बयार?” → मानव समाज में शांति, आर्थिक लोकतंत्र (संपत्ति और संसाधनों का समान वितरण), सामाजिक लोकतंत्र (समानता और न्यायपूर्ण समाज) आदि प्राप्त करने के लिए बदलाव की लहर (सकारात्मक परिवर्तन की हवा) कब आएगी। संक्षेप में, यह असंतोष की पुकार है: दुनिया की समस्याओं को देखते हुए क्रांति न केवल जरूरी है, बल्कि अपरिहार्य है — फिर देरी क्यों?

लेखक कहते है कि दुनिया में बड़े लोगों की हालत भी क्या है? उनके रहते मानवता विवश क्यों?मानव अशांति, विश्व अशांति क्यों?लेखक कहता है कि लॉक डाउन के दौरान वह महससू करता है कि लॉक डाउन सौ साल तक हो ही जाना चाहिए । प्रकृति में समस्याएं खत्म। मनुष्य अब समस्या बन चुका है प्रकृति के सामने। ऐसे में लेखक जगत में संहारक शक्ति को विकराल होते देख रहा है। आखिर पूंजीवाद, सत्तावाद ,सामंतवाद कब तक?प्रकृति विदोहन कब तक?वर्तमान नेताओं, दलों से उम्मीदें कब तक? एक एक व्यक्ति, एक एक जर्रा जमीन, प्रकृति के प्रत्येक घटक के हित को अब नया दल, नया नेता चाहिए। ऐसे में एक ओर कुछ लोग ईमाम मेंहदी अर्थात कल्कि महाराज के इंतजार में हैं लेकिन इस इंतजार में नया सृजन, नया पालन बीमार होता जा रहा है।संहारक ही उभर रहा है।वह संहारक किस दिशा में जायेगा ? कभी कभी बीमारी इतनी भयानक हो जाती है कि चिकित्सक अपने हाथ खड़ा कर लेता है और ईश्वर के भरोसे रह मरीज को अस्पताल से घर ले जाने को कहता है? जब पंच तत्व, पूरी पृथ्वी ही बीमार हो जाएगी ,प्रदूषित हो जाएगी तो सकारात्मक ऊर्जा भी क्या करेगी? जो मानव समस्या बन चुका है प्रकृति अभियान के लिए ,उसका समाधान क्या है? लेखक कहता है कि ऐसे में क्रांति की जरूरत क्यों नहीं?यहाँ क्रांति से मतलब सुधार के लिए बदलाव को स्वीकार करने भर से है। यदि नहीं तो हादसे घटने प्रकृति में स्वाभाविक हैं। “अशोकबिन्दु ठीक कहते हैं कि जब देश गुलाम हो रहा था तो देश की जनता व राजा एक जुट नहीं थे इसी तरह आजकल भी है।नेता और जनता समाज व देश में अमन व शांति के लिए एक जुट नहीं हैं। जो गांधी का विरोध करते हैं वे भी कब नेता जी सुभाषचंद्र बोस,भगत सिंह के रास्ते पर चल रहे हैं?कुछ लोग अब मुसलमानों को दोष दे रहे हैं लेकिन जिस गांव व वार्ड में मुसलमान नहीं रहते वहां क्या सब ठीक है ?और जो जातिगत आरक्षण का विरोध कर रहे हैं वे क्या अन्य जातिगत व्यवस्था का क्या विरोध कर रहे हैं?बात को समझो, जागो तभी सबेरा।जय भारत ,जय भारतीयता। “

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