आखिरी दांव एक राजनैतिक उपन्यास है और इस उपन्यास के माध्यम से अरूणिमा दूबे जननेताओं और राजनैतिक पार्टियों के नैतिक पतन, मौकापरस्ती, अवसरवादिता, दांव-पेंच, साम-दाम-दण्ड-भेद की मानसिकता दिखाने का एक प्रयास करती हैं। लोकतंत्र केवल मतपत्रों से नहीं चलता, वह विचारों, विश्वासों और सत्ता की अदृश्य शतरंज से संचालित होता है। राजनीति के इस विराट मंच पर सिद्धांत अक्सर परिस्थितियों से हार जाते हैं और अवसरवाद ही अंतिम सत्य बन जाता है। “आखिरी दांव” उसी राजनीतिक यथार्थ की कथा है—जहाँ विचारधाराएँ परिस्थितियों के आगे झुकती हैं, रिश्ते महत्वाकांक्षा की भेंट चढ़ते हैं, और सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए हर चाल वैध मानी जाती है। यह उपन्यास किसी व्यक्ति, दल या घटना विशेष पर आधारित नहीं है। इसके सभी पात्र और प्रसंग काल्पनिक हैं, किंतु यदि कहीं समकालीन राजनीति की झलक मिलती है तो वह केवल संयोग होगा। इस कथा में मीडिया की भूमिका, गठबंधनों की अनिवार्यता, परिवार के भीतर सत्ता-संघर्ष और जनादेश के नाम पर खेले जाने वाले दांव—सब एक साथ गुंथे हुए हैं। यह कहानी केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने की है। यह कहानी केवल विचारधारा की नहीं, बल्कि महत्वाकांक्षा की है। और सबसे बढ़कर—यह कहानी उस “आखिरी दांव” की है, जिसे खेलने के बाद लौटने का कोई मार्ग नहीं बचता। एक लेखिका के रूप में उनका प्रयास रहा है कि राजनीति के चमकदार आवरण के पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक द्वंद्व और नैतिक उलझनों को शब्द दिया जाए। यदि यह कथा पाठकों को सोचने पर विवश करे, प्रश्न उठाए, या व्यवस्था को नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा दे—तो उनका लेखन सफल होगा। प्रतिक्रियाएँ और मार्गदर्शन सदा अपेक्षित हैं।





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