महर्षि अरविन्द ने कहा है कि भविष्य में कविता सूत्र में रची जाएगी। ‘क्षणिकाएँ’, ‘छोटी कविताएँ’ रची जा रही हैं, किंतु सामासिक कसाव, बिंब, अनुभूति, अभिव्यक्ति से हाइकु का स्वभाव एक विशिष्ट स्थान रखता है। जापानी काव्य-विधा ‘हाइकु’ ने अपनी संक्षिप्तता एवं तीक्ष्ण संप्रेषणीयता के दम पर हिंदी कविता में स्थान बना लिया है। हिंदी कविता में यद्यपि बरवै, दोहा आदि मुक्तक काव्य प्रचलन में रहे हैं और इनमें दोहा सर्वाधिक लोकप्रिय भी हुआ, तथापि हाइकु की चाँदनी से हिंदी काव्याकाश समुज्ज्वल है। नयी कविता के आगमन से कविता के लिए छंद-साधना की आवश्यकता तो न के बराबर रह गई, पर उसकी सफलता के लिए नवीन, आकर्षक एवं गद्यात्मक लय वाली बिम्बयोजना की आवश्यकता बनी रही। संभवतः यही आवश्यकता हाइकु-रचना के लिए वरदान सिद्ध हुई है। कदाचित् एक चिन्ताकर्षक बिम्ब रचना जो वर्णिक अनुशासन (5-7-5) में निबद्ध हो, हाइकु ही है। हाइकु लिखने का कोई एक और पूर्वनिश्चित फार्मूला नहीं है। वह दृष्टि भी है और दृश्य भी। उसकी अनेक लय और तुकें हो सकती हैं, अनेक बुनावटें। कहीं वह स्वगत, कहीं संवाद, कहीं संकेत-सुझाव, कहीं कथाशैली, कहीं विरोधी बिम्ब/प्रतीक, कहीं एक बिम्बभंगी, कहीं अनुभव तो कहीं एक हाव और कहीं एक संचारी का सहारा लेकर वह अर्थ ध्वनित कर जाता है। 5-7-5 का वर्णक्रम सामान्यतः ऊपरी विन्यास है – बेहद सहज, पर भीतरी विन्यास जटिल-मिश्र मर्म सहजता का संचय होता है। अतः वे हाइकु अच्छे बन पड़ते हैं जिनमें लक्षणा या व्यंजना शक्ति का प्राधान्य होता है। अभिधा में रचा हाइकु प्रायः सपाटबयानी से आगे नहीं बढ़ पाता। मेरी दृष्टि में एक सफल हाइकु में वर्णिक अनुशासन के साथ-साथ हृदयानुभूत प्राकृतिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक सत्य अथवा सामयिक बोध की लयात्मक प्रस्तुति का होना आवश्यक है। आशय यह है कि जहाँ हाइकु कविता में प्रयोग की विविध संभावनाएँ हैं जो कविता के अंदर भी हैं और उसके बाहर प्रस्तुतीकरण में भी हैं, वहीं इसके प्रयोग की अपनी सीमा भी है कि इसे किसी कथानक को काव्यबद्ध करने में छंद की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। वस्तुतः हाइकु में उसके शिल्पगत अनुशासन के भीतर भी प्रयोग की तमाम संभावनाएँ छिपी हुई हैं। चूँकि हिंदी हाइकु पूरी तरह भारतीय रंग में रंग चुका है, अतः हिंदी कविता की तमाम विशेषताओं, प्रवृत्तियों को इसमें समाहित किया जा सकता है। रस, अलंकार, समास के कितने ही प्रयोग 17 वर्णों की सीमा में रहकर भी किए जा सकते हैं। नई छंद मुक्त कविता को छोड़कर हिंदी की शेष काव्यधारा पहले से ही अनुशासनप्रिय रही है, अतः हाइकु का अनुशासन उसका बंधन नहीं हो सकता है। किसी हाइकु में कविता की जितनी विशेषताएँ और गुण समाहित होते जाएंगे, वह उतना ही महत्वपूर्ण होता जाएगा। यह हाइकुकार विशेष की क्षमता पर निर्भर करेगा कि वह अपनी हाइकु रचनाओं को कितना महत्वपूर्ण और उपयोगी बना पाता है। हाइकु हिंदी जगत के काव्य की नवीनतम विधा है। अभी इस विधा पर बहुत काम होना शेष है। अभी तक जितने हाइकु-संग्रह आए हैं, उन्हें आप नींव के पत्थर कह सकते हैं। समीक्षात्मक पुस्तकें भी अभी प्रचुरता से सामने नहीं आई हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास ने अभी इस विधा की परिगणना तक अपनी विवेचना में नहीं की है। वास्तव में हाइकु के रूप में हिंदी को एक ऐसा छंद प्राप्त हुआ है जिसका हमें भूमंडलीकरण काल में हार्दिक स्वागत करना चाहिए। यदि चीन, जापान आदि अनेक देश ‘बौद्ध धर्म’ एवं ध्यान साधना आदि को अपना बना सकते हैं, तो क्या हम अपना छंद-भंडार बढ़ाने के लिए एक नया छंद नहीं अपना सकते? आधुनिक काल में वैसे भी छंद कविता की अनिवार्य शर्त नहीं रहा। दूसरे, कोई भी छंद हो, वह अभिव्यक्ति का साधन मात्र है। प्रत्येक कवि को अपनी अभिव्यक्ति का साधन चुनने की स्वतंत्रता है। मुख्य बात यह है कि उस छंद के माध्यम से कवि का कथन पाठक अथवा श्रोता तक सम्प्रेषित हो। छंद, अलंकार, प्रतीक, बिम्बादि का प्रयोग सृजन सम्प्रेषणीयता को सुलभ बनाने के लिए ही रचना अर्थवान बनती है। डॉ. दयाकृष्ण जी हिंदी साहित्याकाश में देदीप्यमान नक्षत्र हैं। उन्होंने अपनी लेखनी से सदैव हिंदी साहित्य को प्रकाशित किया है। ‘त्रिपादिका’ एवं ‘एक और वामन’ जापानी हाइकु छंद में लिखी डॉ. ‘विजय’ की क्रमशः चौदहवीं एवं पंद्रहवीं काव्य कृतियाँ हैं। इसमें उन्होंने जीवन के गहन अनुभवों व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का वर्णन ‘हाइकु’ कविताओं द्वारा प्रस्तुत किया है। उन्होंने जीवन के विविध रूप, विविध आयाम हमारे समक्ष प्रस्तुत किए हैं। डॉ. विजय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उद्गाता एवं पुरोधा कवि हैं।
नैतिक मानव मूल्यों के प्रति उनकी गहरी आस्था किसी से छिपी नहीं है। साहित्य में भाव के स्तर पर ही नहीं, डॉ. ‘विजय’ भाषा के स्तर पर भी परिष्कृत मानसिकता के विश्वासी हैं। वे साहित्य को लोकाराधन का तथा समाज-निर्माण का अधिष्ठान मानकर चलते हैं।
लघु शोध-प्रबंध के प्रथम अध्याय में जापानी छंद हाइकु की व्युत्पत्ति, हाइकु का अर्थ, हाइकु की परिभाषाएँ पाश्चात्य एवं भारतीय विद्वानों द्वारा प्रस्तुत की गई हैं।
द्वितीय अध्याय में हाइकु का उद्भव एवं विकास का चित्रण है।
तृतीय अध्याय में डॉ. दुयाकृष्ण विजयवर्गीय जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को उद्घाटित किया गया है।
चतुर्थ अध्याय में ‘त्रिपादिका’ हाइकु कृति में वर्णित हाइकु कविताओं का विश्लेषण एवं मूल्यांकन किया गया है।
पंचम अध्याय में ‘एक और वामन’ हाइकु कृति में वर्णित हाइकु कविताओं को मूल्यांकित किया गया है।
उपसंहार में लघु शोध-प्रबंध के निष्कर्ष एवं उपलब्धियों का वर्णन किया गया है।



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