शक्ति-पात परंपरा में साधन और सेवा मुख्य अंग हैं । साधन में प्रगति के लिए परमात्म-शक्ति गुरु के प्रति श्रद्धा-समर्पण का भाव होना जरूरी है । इसके लिए भजन गायन और लेखन महत्वपूर्ण विधा है। साधक अपने अंतर्मन की गहराइयों में छुपे कलुषित संस्कारों को देख कर आत्मग्लानि से भर जाता है और परमात्म-शक्ति से अनुनय-विनय-प्रार्थना,उपालंभ करता है कि हे माँ, हे प्रभु, हे गुरुदेव, हे परमात्मा मुझे विकारों से मुक्त कर अपनी शरण में ले लो । मैं निर्बल,असहाय हूँ, मुझ पर कृपा करो ।
परम-पूज्य गुरुदेव स्वामी शिवोम तीर्थ महाराज जी के भजनों ने अनेक साधकों की कुंडलिनी जागरण में कृपा-दान किया है ;साधकों के मन को शुद्ध किया है।प्रस्तुत भजन संग्रह में निश्चित रूप से गुरदेव के आशीष-वचनों की छाप होगी जिसे मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ ।
इस भजन संग्रह के सभी भजनों की प्रेरणा ,भाव ,शब्द मेरे गुरुदेव ब्रह्मलीन स्वामी गोविंदानन्द तीर्थ महाराज जी के हैं । मैं तो निमित्तमात्र प्रस्तुति कर रहा हूँ । योग श्री पीठ ऋषिकेश आश्रम की पावन धरा पर गुरुदेव ने मेरे माध्यम से यह भावांजलि सृजित की । मैं ये सभी भजन गुरुदेव को सायंकाल आरती के पश्चात सुनाया करता था । एक बार गुरु जी बोले कि ये भजन छपवा दूँ तो अनायास मैंने कह दिया कि “जी गुरुजी,किन्तु लेखक की जगह आपका नाम रहेगा” तो गुरु जी मौन हो गए ।आज गुरु जी के ब्रह्मलीन होने के इतने वर्षों के उपरांत पुस्तक के रूप में इन्हें प्रकाशित करने की प्रेरणा मिली । मैं इसे भी गुरुसेवा मान कर,कर रहा हूँ । इसमें मेरा कुछ नहीं है।“गुरु के गीत” गायन कर साधक, गुरु-शक्ति की अनुभूति कर सकें, दिव्य-शक्ति-स्पंदन हो सके, गुरु महाराज से यही प्रार्थना है ।
आप सबको प्रेम प्रणाम । जय जय गुरुदेव ॥
अक्षय नारायण तिवारी





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