भाषा और साहित्य किसी भी प्रकार की भौगोलिक सीमाओं में बंध कर नहीं रह सकते क्योंकि साहित्य मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति होता है। इसका देशकाल की सीमाओं से स्वतंत्र होना स्वाभाविक है। यह स्थिति विभिन्न देशों और उनमें विकसित होने वाली विभिन्न सांस्कृतिक इकाइयों के मध्य उभरती है जो अपने साहित्य एवं संस्कृति की पहचान को जीवित रखने हेतु सदैव तत्पर रहती है। आज हिन्दी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति भारतवर्ष से दूर विदेशों जैसे अमेरिका, कनाडा, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैण्ड, रूस, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, यूरोप एवं एशिया के विभिन्न देश, दक्षिण अफ्रीका, खाड़ी देश आदि में अपना विशिष्ट स्थान प्राप्त करने में सफल रही है।
हिन्दी भाषा एवं साहित्य के अंतरराष्ट्रीय विकास विषय पर शोध अध्ययन करने से मुझे यह ज्ञात हुआ कि हिन्दी भाषा एवं साहित्य के विकास में अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के संदर्भ में तटस्थ आलोचनात्मक अध्ययन का अभाव रहा है। इस दृष्टि से तटस्थ होकर गवेषणात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन कर विचार प्रस्तुत करना मेरे अध्ययन का मुख्य लक्ष्य रहा है।
आज तक हिन्दी भाषा एवं साहित्य के अंतरराष्ट्रीय विकास से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार की सामग्री अनेक विश्वविद्यालयों, पत्र-पत्रिकाओं, साहित्यिक कृतियों में बिखरी पड़ी है, उन्हें एकत्रित कर और जहाँ तक सम्भव हो प्रवासी हिन्दी साहित्य, विश्वहिन्दी सेवी संस्थाएओं एवं उनके कार्यों तथा प्रवासी हिन्दी पत्रिकाओं का अध्ययन कर उनके विविध पक्षों को समझने का प्रयास, प्रस्तुत शोध में किया गया है। शोध कार्य द्वारा हिन्दी भाषा एवं साहित्य के अंतरराष्ट्रीय विकास में उत्पन्न समस्याओं को ना केवल उजागर किया गया है बल्कि उन समस्याओं का यथासम्भव हल भी प्रस्तुत करने का प्रयास मेरे द्वारा किया गया है। जहाँ तक सम्भव हो सका प्रवासियों से साक्षात्कार कर उनके विविध पक्षों को समझने व जानने का प्रयास भी किया गया है। अंत में ‘उपसंहार’ के अंतर्गत शोध कार्य की समीक्षा व मूल्यांकन किया गया है। प्रत्येक अध्याय को बिंदुओं के आधार पर सूक्ष्म चिंतन तथा सटीक व तथ्यात्मक विश्लेषण के साथ प्रस्तुत किया गया है।





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