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LANKA MEI VIBHISHAN…?! / लंका में विभीषण …?!

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सन 2075 -90 ई0 के बीच का समय !! भूकम्प!बाढ़!तूफान!!भूस्खलन!!चटकती धरती!!फूटते ज्वालामुखी !! पूरे के पूरे खाली होते शहर व गांव!! लोगों को स्वयं को बचाना ही मुश्किल !! क्या अमीर क्या गरीब ?सबकी हालत एक सी बराबर !!  शहर व गांव से भागते लोग !!जिस बीच अनेक अमीरों, बनाबटी जीवन जीने वालों की मौतें !! एक अधेड़ जिसे अभी तक लोग सनकी पागल आदि कह कर  उपेक्षित किए पड़े थे ,वह चीख – चीख कह रहा था – हमें तुम लोग उस वक्त भी गिजाइयों की तरह दिखाई देते थे। पड़े थे न जाने किस – किस के पीछे ?अब उन्हें बुलाओ मदद के लिए ? अब तुम्हें क्यों वे लोग याद आ रहे है जिन्हें तुम सब उपेक्षित कर दिए ? पड़े थे गांव, वार्ड, नगर के अमीरों के,जाति के अमीरों के,मजहब के अमीरों के पीछे ? और ऊपर से कहते हो कि हमारा क्या दोष ? दोष है क्यों नहीं? नेताओं को चुन कर तुम ही लोग भेजते रहे? वेद गीता की बातों को नजरअंदाज करने वाले पुरोहितों के पीछे पड़े रहे? विभिन्न उपासना पद्धितियों में उलझे रहने से क्या ?धर्म नजर ही नहीं आता। जब कोई शोषित,परेशानहोता है और अपनी बात कहना चाहता है तो पूरा का पूरा तन्त्र उसके खिलाफ ही होता है?किसी के राज्य के आदेश पर चलना अलग बात है और प्रकृति अभियान ,मानवता आदि में सज्ज होना अलग बात है? इस बीच अब्दुल नाम का एक किशोर कुछ ध्यान आया और भाग खड़ा हुआ शहर की ओर ! उसके पीछे पीछे किशोरी रश्मि भी भागी। पूरा का पूरा शहर स्त्रियों-पुरूषों से विहीन था। दोनों एक मकान में घुसे जहां बड़ी देर में एक पांडुलिपि मिली – ” लंका में विभीषण ! ” अब दोनों जंगल के बीच आर्य समाज के एक कार्यक्रम में उपस्थित थे।जहां कुछ सन्त आते है और रश्मि व अब्दुल को दूर कहीं जंगल के बीच एक खंडहर में ले जाते है जहाँ ‘विश्व जगेबा ‘ का आश्रम था। एक बुजुर्ग सन्त जो दोनों को बताते हैं कि सन 1883 ई के आसपास यह अब्दुल ‘ आबो रतन ‘ के नाम का एक युवक था और तुम रश्मि रश्मि नाम की ही एक युवती। जब तुम दोनों कक मालूम चला कि कुछ पुरोहित ज्योतिबा फूले व सावित्री फूले की हत्या करने की योजना बनाये हैं तो तुम दोनों कुछ सशत्र घुड़सवारों के साथ निकल पड़े थे लेकिन जंगल के बीच एक संघर्ष में ‘आबो रतन’ मारा गया।इस पुस्तक में बताया गया है कि लेखक का सूक्ष्म शरीर  विभीषण के सूक्ष्म से मिलता है। तब कुछ वार्ता होती है। वार्ता के दौरान विभीषण कहता है कि  आजकल राम भक्त हों या रावण भक्त कोई मुझ चरित्र को अपने कुनबे में नहीं चाहता। यहाँ तक कि राम भक्त भी कहते मिल जाते हैं कि परिवार का मुखिया या अपने बिरादरी या अपने रिश्तेदारी में कोई कितना बड़ा अपराधी हो उसका विरोध नहीं करना चाहिए। यह भी सुनने को मिलता है कि लाख मतभेद के बावजूद भी अपने घर के शेर को मत मारो, वरना बाहर के गीदड़ तुम्हें नोच खाएँगे.. !! लेकिन हमें तो धर्म से मतलब है,भक्ति से मतलब है। अंदर – बाहर से क्या मतलब ? क्रांतियां तभी घटित होती हैं जब त्याग होता है?कफ़न बांध कर जब चला जाता है।हमें दुःख है, धर्म में जीने का मतलब है धर्म में जीना न कि अपने देह,कुनबा,जाति ,समुदाय आदि को बचाना वरना धर्म को बचाना । इसी तरह नारद ऋषि के चरित्र को अब खुद को ब्राह्मण व सनातनी मानने वाले नहीं समझ पर रहे हैं। विभीषण यह भी कहता है कि आदि काल से अब भी अनेक सूक्ष्म शरीर  धरती व धरती के चारो ओर विचरण कर रहे हैं,जो उस समय के ही ठहराव में है जब वे अपनी देह त्यागे थे।

लेखक कहता रहा है कि ये देह, अन्य  देहें, जगत की हर वस्तु, घटना तो पर्दा है  सूक्ष्म जगत, आभा तन्त्र, आत्मा तन्त्र, अनन्त यात्रा का । अब इसे क्वांटम साइंस भी कह रहा है।

हम क्वांटम साइंस में  किसी देह के सुई के नोंक से भी कम अंश से अनन्त के अहसास की ओर पहुंच सकते हैं।ऐसा ही होता है उन कब्रों, खंडहरों, किलों आदि में छिपे कुछ अतीत के अवशेषों से,यदि वह अतीत के किसी जीव या मनुष्य के देह का कोई सूक्ष्म से सूक्ष्म अंश है तो उसके माध्यम कोई उसके त्रिकाल दर्शन तक पहुंच सकता है।

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