साहित्य की तमाम विधाओं में ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जो सीधे रूह से निकलकर रूह में पैबस्त हो जाती है। यह महज़ शे’रों की बुनावट या काफ़िए-रदीफ़ का खेल नहीं बल्कि दिल के उन छिपे हुए ज़ज़्बातों का बयान है जिन्हें आम बोलचाल की ज़ुबान में बयाँ करना मुमकिन नहीं होता। जब अंतर्मन के द्वंद्व, प्रेम की बेपनाह कशिश और वक़्त के थपेड़े किसी बहर के साँचे में ढलते हैं तो एक ग़ज़ल का जन्म होता है। मेरा नया ग़ज़ल संग्रह “एक भी गुल न मुक़ाबिल उसके” मेरी उसी रूहानी और ज़ज़्बाती यात्रा का एक ऐसा पड़ाव है जहाँ हर शे’र मेरे वजूद का एक हिस्सा बनकर काग़ज़ पर उतरा है। इस संग्रह का शीर्षक ही इस बात का गवाह है कि कायनात के तमाम रंगों और गुलों की ख़ूबसूरती भी उस परम-सत्ता, उस असीम प्रेम और उस महबूब के हुस्न-ओ-सादगी के सामने कमतर है। यह संग्रह मेरे उन्हीं अहसासों का एक अदब भरा नज़राना है जो मैंने अपने एकांत के सन्नाटों में बुने हैं।
बीते एक साल के अपने इस रचनात्मक सफ़र पर जब मैं नज़र डालती हूँ तो यह यात्रा मुझे बेहद बहुरंगी और जीवंत लगती है। इस एक वर्ष में मैंने लेखन के कई छोरों को छुआ है। कभी गीतों की तरलता में बहना अच्छा लगा, कभी कविताओं की गहराई ने मुझे आकर्षित किया, कहानियों के किरदारों के ज़रिए मैंने जिंदगी के यथार्थ को टटोला तो कभी बाल-गीतों की निश्छल मासूमियत में ख़ुद को पूरी तरह से खो दिया लेकिन इन तमाम विधाओं के बीच भी मैं ग़ज़ल कहना नहीं भूलीं। ग़ज़ल से मेरा एक ऐसा अनूठा और रूहानी मोह हो गया है जिसे शब्दों में बाँधना मुमकिन नहीं। ज़िंदगी की आपाधापी और मसरूफ़ियतों के बीच जब भी मुझे फ़ुर्सत का कोई छोटा सा टुकड़ा या एकांत का कोई पल मयस्सर होता, मेरे ज़ेहन में कोई न कोई मिसरा चुपके से आकर गुनगुनाने लगता था। वह फ़ुर्सत जैसे ख़ुद-ब-ख़ुद ग़ज़ल के नाम समर्पित हो जाती और एक विधा से दूसरी विधा में छलाँग लगाते हुए पन्नों पर एक-दो ग़ज़लें बहर के साँचे में ढल ही जाती थीं। बहुत बार ऐसा भी होता था जब मैं सोने की तैयारी कर रही होती थी लेकिन कोई ना कोई मिसरा दिमाग में घूमने लगता था। इससे पहले कि नींद मुझे अपनी आगोश में समा ले, मैं जल्दी से अपनी नोटबुक निकालती और सारे ख़्याल उस नोटबुक में नोट कर लेती ताकि नींद की वजह से कहीं कुछ छूट न जाए। मेरी इसी दीवानगी ने ही मुझसे एक और गजल संग्रह लिखवा दिया। धीरे-धीरे फ़ुर्सत के इन्हीं कतरनों में बुनी गईं ग़ज़लें आज इस मुकम्मल किताब की शक्ल में आपके सामने हैं।
ग़ज़ल के प्रति इस दीवानगी और रूहानी जुड़ाव की जड़ें आज की नहीं हैं बल्कि इसकी शुरुआत आज से लगभग छह-सात साल पहले ही हो चुकी थी। उस दौर में जब मैं बड़े-बड़े अज़ीम शायरों की ग़ज़लों को सुनती थी तो उनका लहज़ा, उनकी नफ़ासत और शे’रों की गहराई मुझे भीतर तक लुभा जाती थी। विशेषकर रात के सन्नाटे में, जब सारी दुनिया सो रही होती थी और रेडियो पर किसी मख़मली आवाज़ में ये ग़ज़लें गूँजती थीं तो मेरे अशाँत मन को एक अलौकिक सुकून मिलता था। और इक़बाल साहब की यह ग़ज़ल तो मेरी रूह में उतर जाती थी…
“कभी, ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र, नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मेरी जबीन-ए-नियाज़ में”
रेडियो से छनकर आती मौसिक़ी और लफ़्ज़ों का वह जादू मेरे दिल में इस कदर उतर जाता था कि मेरे भीतर भी इस विधा को गहराई से सीखने और समझने की एक तड़प जाग उठी। मुझे महसूस हुआ कि जो सुकून मुझे दूसरों की ग़ज़लें सुनकर मिलता है, क्यों न उसी सुकून को मैं अपने ही ज़ज़्बातों को बहर और वज़न के धागे में पिरोकर हासिल करूँ। बस, वही रात का सन्नाटा और रेडियो पर बजतीं वो धुनें मेरी इस ग़ज़ल-साधना की बुनियाद बन गईं।
इस ग़ज़ल-साधना के मार्ग पर यदि मैं पीछे मुड़कर देखूँ, तो पारंपरिक अर्थों में मेरा कोई उस्ताद या गुरु नहीं रहा। मेरी इस यात्रा में एकलव्य की तरह किताबों, स्वाध्याय और आधुनिक माध्यमों ने ही मेरे मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। बड़े शायरों की किताबों को पढ़-पढ़कर मैंने शे’रों की नफ़ासत और लफ़्ज़ों के मिजाज को समझने की कोशिश की। इसके साथ ही, सोशल मीडिया पर होने वाली साहित्यिक चर्चाएँ, ज्ञानवर्धक लेख और इस विधा के जानकारों के विमर्श मेरे लिए किसी पाठशाला से कम नहीं थे। जब भी अरूज़ के नियमों या बहर और वज़न के किसी पेच में मन उलझता, तो मैं गूगल का सहारा लेती और वहाँ से बारीक से बारीक जानकारी जुटाकर अपनी शंकाओं का समाधान करती। तकनीक और साहित्य के इसी अनूठे मेल से, बिना किसी व्यक्तिगत सानिध्य के, मैंने इस कठिन विधा का थोड़ा-बहुत सलीका सीखा। आज जो भी टूटे-फूटे मिसरे और शे’र मैं इस साँचे में ढाल पाई हूँ, वह इसी आत्म-अध्ययन, लगन और माँ सरस्वती की असीम अनुकंपा का ही प्रतिफल है।
इस संग्रह को आकार देते समय मेरे भीतर जज़्बातों का एक ऐसा सैलाब था जिसे सिर्फ़ बहर और वज़न के अनुशासन में ही बाँधा जा सकता था। इन ग़ज़लों के पन्नों को पलटते हुए पाठक सिर्फ़ शे’र नहीं पढ़ेंगे बल्कि उस रूहानी कशमकश और एहसास से भी गुज़रेंगे जो इन्हें लिखते वक़्त मेरे दिल ने महसूस किए हैं। इस गुलदस्ते से कुछ ऐसे चुनिंदा शे’र यहाँ साँझा कर रही हूँ जिन्होंने मेरे भीतर एक गहरी हलचल पैदा की।
यह शे’र प्रेम के उस अनूठे मिजाज और स्वाभिमान को बयाँ करता है जहाँ दिल अपनी शर्तों पर जीता है। दिल के मामलों में किसी की न सुनने वाली अना जब प्रियतम के मनाने पर झुक जाती है तो वह समर्पण और मोहब्बत की सबसे ख़ूबसूरत जीत बन जाती है।
“दिलों के खेल में सुनती नहीं किसी की मैं
मना तू ख़ैर तेरी बात मान ली मैंने”
और इसे कहते समय मेरे ज़ेहन में हुस्न की उस मारक क्षमता और सम्मोहन का नक़्शा था जो शब्दों के परे होता है। उन पलों में मैं सौंदर्य के उस रसीले मिज़ाज को जी रही थी जहाँ किसी की सादगी ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति बन जाती है। जुल्फ़ों का रेशमीपन, आँखों का नाज़-ओ-अंदाज़ और फूलों सी रंगत मुझे हुस्न के ऐसे ‘हथियार’ लगे जिनके आगे दिल बिना किसी जंग के चुपचाप हार मान लेता है।
“रेशमी ज़ुल्फ़ निगह-नाज़ गुलों सी रंगत
पास उसके कई हथियार हुआ करते थे”
इसे लिखते समय मेरे भीतर उस स्त्री की बेबसी का अहसास था जो रिश्तों में अपनी पूरी हस्ती सौंप देती है। मुझे महसूस हुआ कि कभी-कभी बेहद आत्मीय और घरेलू उपमाओं के ज़रिए ही हम उस गहरे दर्द को बयां कर सकते हैं जहाँ सामने वाला अपनी सहूलियत और मर्ज़ी के मुताबिक़ हमारे अस्तित्व को इस्तेमाल करता है।
“मैं उसके वास्ते ताज़ा चपाती सी हूँ लज़्ज़त में
कि जब भी दिल करे उसका निवाला तोड़ लेता है”
इस शे’र को कहते वक़्त मैं जीवन के उस शाश्वत सच को जी रही थी कि मुश्किलें चाहे कितनी भी आएं, अगर भीतर उम्मीद की एक किरण भी ज़िंदा है तो इंसान पूरी तरह कभी नहीं बिखरता। यह शे’र मेरे लिए महज़ लफ़्ज़ नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में डटे रहने का मेरा अपना आत्मीय हौसला है।
“ज़िंदगी ये क़दम-क़दम टूटी
फिर भी उम्मीद से है कम टूटी”
कहने को तो बहुत कुछ है लेकिन यही कहूँगी कि अंत में जब मैंने अपनी इस ग़ज़ल-साधना को समेटा तो इस मक़्ते को कागज़ पर उतारते समय मेरे मन में एक गहरा संतोष और सुकून था। मुझे लगा कि ज़िंदगी की इस जंग में हार-जीत चाहे जो भी रही हो पर मुझे इस बात का फ़ख़्र हमेशा रहेगा कि मेरी आख़िरी साँस तक मेरे भीतर के हौसलों ने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा।
“है तसल्ली मुझे यही ‘मीरा’
कम से कम हौसले न छोड़े थे”
बहुत से लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं कि यह ‘मीरा’ नाम कहाँ से आया? असल में यह नाम किसी साहित्यिक प्रेरणा की तलाश नहीं बल्कि मेरे दादाजी का वो अनमोल तोहफा है जो उन्होंने मेरे जन्म पर मुझे दिया था। घर का वही दुलारा नाम आज मेरा तख़ल्लुस बन चुका है; वही प्यारा नाम आज मेरी पहचान और मेरी लेखनी का आधार है। दादाजी का दिया वह नाम और माता-पिता का दिया वह जज़्बा—आज इन दोनों की बदौलत ही मैं इन अल्फ़ाज़ों को पन्नों पर उतार पाई हूँ। जब मैं अपनी ग़ज़लों के आखिर में ‘मीरा’ लिखती हूँ, तो मुझे महसूस होता है कि मेरे बड़ों का आशीर्वाद हर शब्द के साथ मेरे साथ चल रहा है। मुझे इस बात का फ़ख़्र हमेशा रहेगा कि मेरी आख़िरी साँस तक मेरे भीतर के हौसलों ने और मेरे बड़ों के इस आशीर्वाद ने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा।
जहाँ तक मेरी इस ग़ज़ल-साधना के शिल्प-सौंदर्य और तकनीकी पक्ष का प्रश्न है, मैंने हमेशा यह माना है कि ग़ज़ल महज़ ज़ज़्बातों की रवानी नहीं बल्कि एक बेहद कड़ा और अनुशासित विधागत व्याकरण है। “एक भी गुल न मुक़ाबिल उसके” संग्रह की इन ग़ज़लों को बुनते समय मैंने अरूज़ के कड़े नियमों, बहर की रवानगी और काफ़िए-रदीफ़ के तालमेल को पूरी शुद्धता के साथ निभाने का प्रयास किया है। शिल्प के धरातल पर मेरी कोशिश यही रही है कि मिसरों में लय और संगीत का ऐसा प्रवाह हो कि पाठक जब इन्हें पढ़ें, तो शे’र सीधे उनके दिल की धड़कन बन जाएँ। मात्राओं के कड़े अनुशासन (वज़्न) में बँधकर भी भावों की तरलता कहीं कम न हो, यही मेरा मुख्य कोशिश रही है।
जहाँ तक भाषा का सवाल है, मेरी भाषा किसी एक दायरे में सिमटी हुई नहीं है बल्कि यह हिंदी की सहज मिठास और उर्दू की मख़मली नफ़ासत का एक बेहद सुरीला संगम है। एक तरफ़ जहाँ इसमें ‘लज़्ज़त’, ‘मुक़ाबिल’ और ‘निगह-नाज़’ जैसे उर्दू के रसीले शब्द बहुत ही स्वाभाविक रूप से ढल गए हैं, वहीं दूसरी तरफ़ ‘हौसले’, ‘उम्मीद’ और ‘ज़िंदगी’ जैसे शब्दों ने इसकी संप्रेषणीयता को और अधिक सरल बना दिया है। मेरी कोशिश हमेशा क्लिष्ट या भारी-भरकम शब्दों से बचने की रही है ताकि आम पाठक भी शे’र के मर्म से सीधे जुड़ सकें। बहर के साथ-साथ कठिन शब्दों के अर्थ भी फुटनोट पर दिए हैं ताकि पाठक ग़ज़ल का पूरा आनंद लूट सकें। उपमाओं और बिम्बों के स्तर पर मैंने अपनी अनुभूतियों को घरेलू और आत्मीय प्रतीकों जैसे वक़्त के पाँव, ग़म की आगोश, अदावत की हवाएँ, वफ़ादार नदी, प्रेम के पेड़ आदि से सजाया है।
ग़ज़ल-साहित्य के विस्तृत परिदृश्य में जब मैं अपनी इस विधा के स्थान को टटोलती हूँ, तो मुझे महसूस होता है कि आज के दौर में जहाँ पारंपरिक बहर और वज़्न के कड़े अनुशासन से रचनाकार अक्सर कतराने लगे हैं, वहाँ यह संग्रह पारंपरिक मर्यादा और आधुनिक संवेदना के बीच एक मज़बूत सेतु की तरह खड़ा है। इन ग़ज़लों को कहते समय मैं स्वयं को साहित्य के उस मुकाम पर खड़ी पाती हूँ जहाँ एक स्त्री अपनी पूरी संवेदनशीलता, आत्मसम्मान, घरेलू यथार्थ और आध्यात्मिक हौसलों के साथ अपनी बात बिना किसी मुखौटे के रखती है। यह संग्रह समकालीन ग़ज़ल विधा में उस शुद्ध और निश्छल परंपरा को आगे बढ़ाता है जो हुस्न-ओ-इश्क़ के दायरों से आगे बढ़कर जीवन के गहरे सच को पूरी ईमानदारी से बयाँ करती है।
मेरा मानना है कि किसी भी कार्य को संपूर्ण करने के लिए ध्यान और योग की परम आवश्यकता होती है। और लेखन के वक्त ये दोनों ही मेरे पास होते थे। इस रचनात्मक यात्रा के मुकम्मल होने पर, मेरा सबसे पहला और कोटि-कोटि नमन उस परमपिता परमेश्वर और माँ सरस्वती के चरणों में है, जिनकी असीम अनुकंपा और आशीर्वाद के बिना मेरी कलम एक लफ़्ज़ भी नहीं लिख सकती थी। उन्हीं की कृपा से मेरे भीतर यह काव्य-चेतना जागृत हुई। इसके बाद, मैं अपने पूजनीय माता-पिता के चरणों में शीश नवाती हूँ, जिनके दिए हुए संस्कारों, आशीर्वाद और निश्छल प्रेम ने मेरे वजूद को गढ़ा और मुझे इस योग्य बनाया।
मेरी इस रचनात्मक यात्रा के पीछे मेरे परिवार और मेरे प्रिय बच्चों स्वप्निल, अनुभव, नेहा और योगिता का वह निश्छल स्नेह और सतत प्रेरणा रही है जिसने मेरी व्यस्त जिंदगी में भी हर नए दिन एक नया मुखड़ा गुनगुनाने की जादुई ऊर्जा दी। इन बच्चों का प्रेम ही मेरी कलम की असली ताकत है। और इस बार, ईश्वर की असीम अनुकंपा से हमारे आँगन में एक नन्हा-मुन्ना फ़रिश्ता ‘अयाँश’ भी जुड़ गया है। उसकी भोली अठखेलियों, मासूम शरारतों और प्रेम ने मेरी पूरी रचनात्मक ऊर्जा को एक नया वसंत, एक नया आसमान और एक अनोखी ताज़गी बख्श दी है। सच कहूँ तो, उसकी हर एक किलकारी मेरे भीतर किसी मधुर बहर की तरह गूँजती है जो मुझे सृजन के एक बिल्कुल नए आनंद से सराबोर कर देती है। उसकी मुस्कान रदीफ़ सी है जो बदलाव के बावजूद हमेशा एक जैसी रहती है और अठखेलियाँ क़ाफ़िए सी जो हमेशा नए-नए रूप बदलती रहती हैं।
जैसे कि कहा जाता है कि हर सफलता के पीछे किसी न किसी व्यक्ति का हाथ होता ही है तो मेरी इस लेखन-यात्रा का सबसे बड़ा आधार स्तंभ मेरे हमसफ़र कुमार शर्मा ‘अनिल‘ हैं क्योंकि मेरी कलम पर उनका अटूट विश्वास ही मेरी इस किताब की असली प्रेरणा है। उन्होंने न केवल मुझे इस ख़ूबसूरत राह पर चलने के लिए प्रेरित किया बल्कि मेरे एकांत का सम्मान करते हुए मुझे वह माहौल भी दिया जिसमें मैं अपने जज़्बातों को बहर में ढाल सकी। उनके सहयोग के बिना शब्दों का यह सफ़र अधूरा था।
मैं उन सभी आत्मीय जनों का भी अंतःकरण से शुक्रिया अदा करती हूँ जिन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मेरी इस साधना को संबल दिया। उन तमाम वरिष्ठ साहित्यकारों, गुरुतुल्य लेखकों और सोशल मीडिया के उन प्रबुद्ध पाठकों का आभार, जिनके लेखों, चर्चाओं और टिप्पणियों ने मेरे भीतर के सलीके को चमकाने का काम किया। मैं उन सभी शुभचिंतकों की भी दिल से शुक्रगुज़ार हूँ, जिनके अटूट विश्वास और सहयोग के बिना घर-परिवार की व्यस्तताओं के बीच इस किताब को आकार देना संभव न होता।
मैं तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ सुश्री दिव्या त्रिवेदी साहिबा और मुंबई के प्रतिष्ठित ‘SGSH Publications’ की, जिन्होंने हमेशा की तरह इस किताब को भी अपनी तकनीकी दक्षता, प्रकाशन की बारीकियाँ, सुरुचिपूर्ण छपाई और त्रुटिहीन सौंदर्य के साथ पाठकों तक पहुँचाने का वादा किया है।
अंत में, मैं अपने उन सभी पाठकों, आलोचकों और प्रशंसकों का अग्रिम आभार मानती हूँ जो मेरी इस 22 वीं किताब और छठे ग़ज़ल संग्रह “एक भी गुल न मुक़ाबिल उसके” की ग़ज़लों को अपने दिलों में जगह देंगे। माँ सरस्वती की असीम अनुकंपा और आप सभी के इस असीम स्नेह को प्रणाम करते हुए मैं गुलों के मुक़ाबिल खड़ी इन 131 ग़ज़लों के गुलदस्ते को आपकी संवेदनशील और पारखी नज़रों के सुपुर्द करती हूँ।
मनजीत शर्मा ‘मीरा’





Be the first to review “Ek Bhi Gul Na Muqabil Uske (Ghazal-Sangrah)”