एक युवती जिसका नाम है ‘दशानन गीता’, जिसके माध्यम से इस पुस्तक को लेखक ने विस्तार दिया है। आदिकाल से वन्य समाज, आदिवासी, मूलनिवासी आदि का सभ्य मानव, राजधानी नगर, नगर सभ्यता से संघर्ष जारी रहा है। इस बीच राज्य, सत्ता की दुनिया में कुछ ऐसे व्यक्तित्व पैदा होते रहे हैं जो बनावटी व्यवस्था के माध्यम से मानव शांति, मानवता, प्रकृति अभियान, ईश्वरता, ब्रह्माण्ड चेतना, अनंत यात्रा आदि को नजरअंदाज करते रहे हैं। अपनी कर्म व्यवस्था, सुरक्षा संस्कृति को ही महत्व देते रहे हैं। ऐसे में युद्ध, हिंसा, गृह युद्ध, मानव अशांति, अमानवता, परभाव उपेक्षा, परोपकारहीनता, प्रकृति विरुद्ध अभियान आदि को ही अवसर मिलता रहा है। धर्म, उपासना के नाम पर रावण जैसे साम्राज्य कर्ता भी हवन, यज्ञ, शिव भक्ति आदि में रहे हैं, लेकिन अपनी दशानन शक्तियों के जागरण की अनंत सम्भावनाओं के बावजूद मात खाते रहे हैं। आज की तारीख में लेखक के अनुसार ब्रह्माण्ड, प्रकृति में सबसे बड़ी समस्या स्वयं मनुष्य बन चुका है। वह सब कुछ है लेकिन मनुष्यता को धारण करने वाला मनुष्य, मनुष्य से देव मनुष्य हो वेद दशा अर्थात सर्वत्र व्याप्त सर्वभौमिक दशा की व्यवस्था व आगे मूल स्रोत की व्यवस्था को छूना तक नहीं चाहता। युवती ‘दशानन गीता’ वन्य समाज से निकल कर आयी है जो कि अपने को ‘असुर’ जाति से मानती है। उसके परिजन अब भी छत्तीसगढ़, झारखण्ड के जंगलों में आदिवासी जीवन जीते हैं, जो अपने को प्रहलाद के पिता व उसके पिता के भाई के वंशजों से जोड़ते हैं। वे आज भी धरती की सबसे पुरानी धरती के भूखंड के मूल निवासी हैं, जो कि प्राकृतिक जीवन, आयुर्वेद, प्रकृति ज्ञान आदि से सूक्ष्म स्तरीय ज्ञान तक जुड़े हैं। ऐसे में रावण उनका महापुरुष हैं जो एक संहिता, लक्ष्मण संवाद के नाम से कुछ संदेशों के माध्यम से अब भी प्रेरणा स्रोत हैं। इस बावजूद कि वह रावण से दशानन की अनंत यात्रा में नकारात्मकता से मुक्त न हो सका, लेकिन अदृश्य रूप से राम अर्थात सर्वत्र व्याप्त शक्ति के बीच उसके उद्धार की सम्भावनाएं कम न थीं।
यह बहुत रोचक, प्रतीकात्मक और रहस्यमय है।





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