यह पुस्तक दस अध्यायों में सुव्यवस्थित है, जिनमें ललित निबंध के स्वरूप, प्रकृति, विशेषताओं, उद्भव, विकास एवं प्रमुख साहित्यिक प्रवृत्तियों से लेकर भारतीय जीवन-दृष्टि, सांस्कृतिक चेतना, परंपरा और आधुनिकता के अंतर्संबंधों का व्यापक विवेचन किया गया है। इसमें आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र एवं कुबेरनाथ राय के योगदान के साथ-साथ भारतीय अस्मिता, लोकसंस्कृति, ज्ञान-परंपरा, लोकजीवन, प्रकृति, ऋतु-संवेदना, भाषा-शिल्प एवं सौंदर्यबोध के विविध आयामों का विश्लेषण प्रस्तुत है। इसके अतिरिक्त, स्त्री-अनुभव, सामाजिक चेतना, मानवीय मूल्य, वैश्वीकरण, तकनीकी युग तथा डिजिटल विमर्शों के संदर्भ में ललित निबंध की बदलती संवेदना, समकालीन चुनौतियों, नवीन संभावनाओं एवं भविष्य की दिशाओं पर भी विचार किया गया है। इस प्रकार, पुस्तक ललित निबंध की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक परंपरा को समकालीन संदर्भों से जोड़ते हुए उसकी विकास-यात्रा का समग्र एवं बहुआयामी परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करती है।






Be the first to review “Lalit Nibandh: Bharatiya Jeevan-Drishti, Parampara evam Samkaleen Vimarsh”