सालों तक प्रिशा को मन में विश्वास था कि प्यार समर्पण है; एक ऐसा एहसास है जिसका इंतज़ार किया जाता है। उसे लगता था कि अगर आप लंबे समय तक इंतज़ार करते रहें, तो आखिर में प्यार खुद-ब-खुद आपकी तरफ़ मुड़कर आपको चुन लेगा। फिर एक दिन, उसने इंतज़ार करना छोड़ दिया। इसलिए नहीं कि उसके दिल में अब प्यार खत्म हो गया था बल्कि इसलिए क्योंकि प्यार के इंतज़ार में वह खुद खत्म हो रही थी। किसी को थामे रखने और उसे जाने देने के बीच, उसे एक ऐसे सवाल का जवाब देना था, जिससे वह ज़िंदगी भर भागती रही थी:- ‘क्या हो अगर जिस प्यार के लिए आप लड़ रहे हैं, अब तक जिसका इंतज़ार कर रहे हैं… वही आप से आपकी पहचान छीन ले और आपको गुम-नामी के अँधेरों में धकेल दे?’
प्रिशा को अभी तक इसका जवाब नहीं पता था। वह बस इतना जानती थी कि इस बार, उसका दिल जवाब मांग रहा था।





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