हिन्दी साहित्य गद्य काल के श्रेष्ठ लेखक रीमा महेन्द्र ठाकुर का जन्म 19 अक्टूबर 1980 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी (भीखरपुर, साकेत प्रान्त अयोध्या) के एक सम्भ्रांत परिवार में हुआ। इनके पिता ठाकुर चंद्रराज सिंह प्रिंसिपल और माता कृष्णावती गृहणी थीं। इनकी शिक्षा स्नातक तक है। बचपन से पढ़ने-लिखने में इन्हें अत्यधिक रुचि थी। बचपन में इन्होंने कुछ बाल कविताएँ और बाल कहानियाँ लिखीं, जो कुछ पत्रिकाओं में छपीं। 11 मई 1999 में इनका विवाह महेन्द्र ठाकुर जी के साथ हुआ, जो मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले के राणापुर में निवासरत थे। पुत्र जन्म के बाद इनका अधिकतर समय लेखन और परिवार के लिए समर्पित था।
25 उपन्यास, 250 लघुकथाएँ, 500 कहानियाँ जो सामाजिक मुद्दों से प्रेरित थीं, पाठकों को अधिक पसंद आईं। वर्तमान में इनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि साहित्य में इनकी अच्छी पहचान बन गई। इनकी सभी कहानियों में छायावादी विचारधारा साफ़ झलकती है। इन्हें गद्य-पद्य दोनों में महारत हासिल है। 5000 से भी अधिक कविताएँ और आलेख इन्होंने लिखे। इनके हिस्से में दो वर्ल्ड रिकॉर्ड, बहुत सारे सम्मान दर्ज हैं। ये इनकी बहुत बड़ी उपलब्धि है। समाजसेवी के रूप में भी इनका सर्वश्रेष्ठ योगदान है। पर्यावरण से लेकर जन जागरण तक इनका सफर बहुमुखी है। इनकी पुस्तकें, 50 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कथाकार रीमा महेन्द्र ठाकुर की कविताओं और कहानियों में हर पाठक को अपनी ज़िन्दगी की तस्वीर और धड़कनें महसूस होती हैं। हर परिस्थिति को दर्शाती इनकी चर्चित कहानियाँ कुबेर सखा, मायका दूर है, विदेह की बैदेही, मुझे जीना है, मेघवर्णी, खड़हर मन को छूती हैं। इनकी कहानियों में जीवन का उतार-चढ़ाव साफ़ झलकता है।
इस संकलन में उन्हीं कहानियों को संकलित किया गया है, जिसे पढ़कर पाठक सोचने पर मजबूर हो जाए। इस संकलन की कहानियों में जीवन के उन पहलुओं को रेखांकित किया गया है, जो पाठकों को आरंभ से लेकर अंत तक बांध रखेगा।





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